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HOW TO CONTROL MIND; MIND "(मन )" and SEX; ABSURD MIND OR विक्षिप्त मन' MAN KE RAHSAY

THE MIND 

The MIND (मन ) is not seen by the our eyes and so one can not say that mind or MAN is not present in the body. But the mind exists.  it can be explained like that Mind is not a noun that can be seen Mind is a verb,  यह पल पल बनता है पल पल में बदलता है , बहुत चंचल है।  











AND SEX

सेक्स यानि सम्भोग स्त्री और पुरुष का शारीरिक मिलान है जिसमे स्त्री और पुरुष के जनन अंग भाग लेते है लेकिन ये मन से नियंत्रित होते है, सम्भोग किया जाता है अपने ही जैसे एक और जीव की उत्पत्ति के लिए लेकिन इस क्रिया के चरमोत्कर्ष के पहुंचने  पर जो अनूठा आनंद मिलता है   उसी  छान को बहुत ज्यादा बढ़ा लेने पर मन को समाधी की और ले जाया जा सकता है 





THE MIND + SEX = ABSURD MIND

विक्षिप्त मन 

कोई व्यक्ति नंगी तस्वीरें देख रहा है, और कल्पनाये कर रहा है मानसिक सम्भोग कर रहा है परन्तु उसके जननांग को अथवा उसके लिंग को इससे कोई लेना देना नहीं है, उसे इससे कोई सरोकार नहीं है, जननांग का काम तो सिर्फ सेक्स करने का है वह तो उस क्रिया में सम्मिलित होफा और काम खत्म होने के बाद वह सब भूल जायेगा उसे नंगी तस्वीरों से कोई मतलब नहीं है, लेकिन व्यक्ति उन तस्वीरों को बार बार देखता हैऔर कल्पना करता है। कभी भूतकाल की यादों में खो जाता है तो कभी भविस्य में जाकर कल्पनाएं करने लगता है लेकिन वर्तमान का जो ये पल है उसे वह खो देता है उस पल को वह नहीं जीता। जबकि मनुष्य को वर्तमान में जीना चाहिए। यह विक्षिप्त मन है। व्यक्ति सेक्स सेंटर को लेकर ही कंफ्यूज है। सेक्स का सेंटर मूलाधार है लेकिन व्यक्ति मन से सेक्स कर रहा है।

सेंटर का कन्फूजन हो गया है  किस कार्य का कौन सा सेंटर है ये ही नहीं पता। जिसका जो काम है उसे करने दे।  सेक्स ऑर्गन्स का काम है सेक्स और निष्कर्सन उसे उसका काम करने दे बजाय मन में सेक्स के बारे में सोचना मन को अगर आप गलत चीजों में उलझायेंगे तो मन विक्षिप्त हो जायेगा और वह अपने मार्ग से भटकने लगेगा और भी कई तरह की गलत आदतों में पड़ जाएगा।  मन एक दिन में नहीं बनता मन धीरे धीरे बनता है और फिर उसमे पक्का हो जाता है और फिर वह आदत बन जाती है।  और जो आदत है उसे व्यक्ति न चाहते हुए भी बार बार करना है क्योंकि वह उसकी आदत है , बार बार करने से मन पक्का हो जाता है और फिर उस आदत को छोड़ना आसान नहीं होता।  और फिर वही संस्कार बन जाता है इसीलिए मन को मन का काम करने दें।

लाइव इन प्रेजेंट एंड बी  इन प्रेजेंट।  वर्तमान में जियें और वर्तमान में रहे यही जिंदगी को जीने का सही तरीका है

वर्तमान में जीने की आदत डालें।  भूतकाल या भविष्य में न जियें।  भूतकाल के बारे में न सोचें अपनी पुराणी यादों में न खोये रहें और न ही भविष्य की कल्पनाये करें। हम अक्सर या तो यादों में जीते है या कल्पनाओं में जीते है  और जब हम भूतकाल या भविष्य में होते है तो हम उस पल को भी खो देते है जो हमारे पास है जिसे हम जी सकते थे।  



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